अंजनगिरी इतिहास

अंजनगिरी इतिहास

अंजनगिरी - प्र्रकृति की गोद में हजारों हजारों साल का इतिहास सेमेटे एक स्थान आज आप सबको पुकार रहा है, वही् स्थान जो कभी इस क्षेत्र की राजधानी समझा जाता था, वहीं स्थान जो रामायण के घटने का सबुत देता है, वहीं स्थान जो हजारों मंदिरों के होने की घटना को दर्शाता है...

पौराणिक काल में विशेष महत्व रखनेवाले नासिक शहर में मात्र 20 किमी तथा हिंदु धर्म के 12 ज्योर्तिलिंग में से 1 माने जानेवाले त्र्यंबकेश्‍वर से मात्र 6 किमी दुरी पर स्थित यह क्षेत्र सह्याद्री पर्वत की रांगों में बसा हुआ है। यहाँ पर पहूँच कर ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने अपनी सारी खुबियाँ यहाँ पर ला रखी है। पहाडीयों से होकर गुजरनेवाले बादल स्वर्ग का अहसास देते है, साल में 6 माह से ज्यादा गिरनेवाली बारिश इसे हराभरा करती है। पहाड की वादियों में गूंजते स्वर मंत्रमुग्ध करते है। और भी न जाने कितनी खुबियाँ यात्रियों को बरबस अपनी और खींच लेती है और उनके मानस पटल पर अपनी अमिट छाप छोड देती है ।

अब बात करते है इसके पौराणिकता की...लगभग एक हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन अंजनेरी तीर्थक्षेत्र का अपना एक गौरवशाली अतीत( इतिहास) रहा है। रामायण के मुख्य पात्रों में से एक, असीम सार्मथ्य एवं अतुल बलधारी अंजनीपुत्र श्री हनुमान की माता अंजनी के नाम से यह इस तीर्थक्षेत्र का नाम पडा अंजनगिरी। कहाँ जाता है कि हनुमान अपने जन्मावस्था के बाद काफी समय तक यहीं रहे । यादवकाल में अंजनेरी ग्राम तथा आसपास के क्षेत्र में काफी संख्या में जैन धर्मावलंबी रहते थे। यहाँ एक जीर्णशीर्ण मंदिर में इ.स. 1142 (शके 1063) का शिलालेख मौजुद है। जिसमें यादलकालीन राजा के एक मंत्री द्वारा अंजनेरी मंदिर के जीर्णोध्दार हेतु दान देने का उल्लेख है। सन 1676 में अंजनेरी औरंगजेब के अधिपत्य में था तब यहाँ के जैन मंदिर ध्वस्त कर दिये गये थे। सन 1708 में अंजनेरी पर मराठा पेशवाओं का अधिपत्य हुआ तब इन मंदिरों के जीर्णोध्दार का प्रयास हुआ। इस तथ्य की पुष्ठि आर्किलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा भी की गई है। इस क्षेत्र पर हम आज भी दिग. जैन आम्नाय की धरोहर जैन मंदिर एवं गुफायें जिनमें हमारे तीर्थकरों की मूर्तियाँ विद्यमान है, जीर्ण-शीर्ण अवस्था में देख सकते है।

यह तो हूई ग्राम में बसे मंदिरों की बात, अब हम चलते है पहाडी की ओर... सह्याद्री पर्वतरंागा में बसे इस पहाडी की समुद्रतल से उँचाई 14300 फीट है। पहाड पर जाने के लिए कच्चा रास्ता बना हुआ है। महाराष्ट्र शासन द्वारा इसे जल्द ही पक्का बनाने का कार्य चल रहा है। । सर्पीलाकार रास्ते से चलते हुए हम मुख्य पहाडी के नीचे तक वाहन से पहूँच सकते है। यहाँ से शुरु होती है पैदल चढाई। कुछ सीढियाँ, कुछ पगदंडिया, कुछ चढाव, कुछ पथरीला रास्ता यह सब आपको टॅ्रकिंग का अनुभव देता है। यहाँ से गुजरकर हम पहूँचते है पहाड के मध्य में बसे दिगम्बर जैन आम्नाय की 2 गुफाओं तक। जिसमें भगवान पार्श्‍वनाथ. भगवान शांतिनाथ, भगवान आदिनाथ तथा अन्य कई मुर्तियाँ अच्छी स्थिती में मौजूद है। गुफा के बाजु में एक कुंड भी है जिसमें सालभर पानी मौजूद होता है। यह भी एक आश्‍चर्य ही है। इन गुफा के दर्शन करने के पश्‍चात फिर शुरु होता है दौर पहाडी के अगले हिस्से में चढने का... कुछ देर सिढियों से चढने के पश्‍चात हम पहूँच जाते है पहाडे के उपरी भाग पर, जहाँ विशाल मैदान है। दूर दूर तक समतल हिस्सा मानों कोई खेल का मैदान हो। यहाँ पर आप सीधे बादलों से बात कर सकता है। बादलों में रहकर साक्षात स्वर्ग का अनुभव प्राप्त कर सकते है। थोडी देर आगे चलने का बाद दिखाई देता है एक मंदिर जिसमें आज भी दिगम्बर प्रतिमायें मौजूद है। आगे और भी 2 मंदिर मौजूद है, जिसमें अलग अलग भगवान की प्रतिमायें खंडित अवस्था में है, जो कि दिगम्बरत्व की पहचान भी देती है।

कुछ देर आगे बढने के पश्‍चात दिखाई देता है एक विशाल सरोवर। इस सरोवर के बारे में कहाँ जाता है कि जब भगवान हनुमान विमान से अपने मामा के साथ जा रहे थे तब वे उस विमान से नीचे गिरे थे और जहाँ उनका पहला कदम पडा वही एक विशाल सरोवर बन गया। उपर से देखने के बाद यह एक पैर के निशान जैसा ही दिखता है। इस तालाब में भी साल भर पानी मौजूद होता है। इसके बगल मे ंही एक और छोटी पहाडी है जहाँ सीता माता का मंदिर मौजूद है।

महाराष्ट्र शासन इस क्षेत्र को पर्यटन क्षेत्र तथा हिल स्टेशन के रुप में विकसित करने जा रही है और इस दिशा में कार्य प्रारंभ भी किया जा चुका है। अतः शासन का ध्यान इस क्षेत्र के विकास की ओर जाने से इसके चहुमुखी विकास की दृष्टि से इसका महत्व और भी बढ गया है तथा इसके उत्तरोत्तर विकास की प्रबल संभावनाएं है।

ग्राम में भी श्याम वर्ण की 3 फीट की अतिमनोज्ञ पद्मासन जैन प्रतिमा खुले आकाश के नीचे विराजित है तथा इसके साथ ही वहीँ पर प्राचीन कलाकृति से पूर्ण 14 दिगम्बर जिन मंदिर भी है। जिनमें कई जीर्ण प्रतिमाएँ है किंतु इसकी समुचित देखभाल न होने से यह मंदिर अंत्यत जीर्णशीर्ण एवं क्षतिग्रस्त हो चुके है। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारी यह प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर अंजनेरी तीर्थक्षेत्र अपना संपूर्ण प्राचीन वैभव एवं गौरव खोकर आज जीर्णशीर्ण एवं रुग्ण अवस्था में है और इसके कायाकल्प की आज नितांत आवश्यकता है।

इसी तथ्य को मद्देनजर अखिल भारतीय दि. जैन तीर्थ संरक्षिणी सभा के अध्यक्ष श्री निर्मलकुमारजी सेठी के मार्गदर्शन एवं परामर्श से सन 2000 में श्री पवन जयचंदजी पाटणी, नासिक की अध्यक्षता में इस क्षेत्र के संरक्षण , नवनिर्माण एवं विकास हेतु एक समिति का गठन किया गया। एवं जैनाचार्य परमपूज्य श्री गुप्तिनंदीजी महाराज की पावन प्रेरणा एवं मंगल आशिर्वाद से यहाँ 21 फीट ऊँची भगवान शांतिनाथजी की विशाल प्रतिमा विराजित करने का संकल्प सन 2006 में लिया गया। तदनुरुप लगभग 100 टन वजनी यह विशाल प्रतिमा केवल एक वर्ष में निर्मित होकर जयपुर से यहाँ लाई गई। वस्तुतः यह एक चमत्कार अथवा अतिशय ही कहा जायेगा। यह विशाल मुर्ति अंजनेरी की पहाड पर 25 फीट उँची वेदी पर विराजित की गई । इसकी विशेषता है कि यह मुर्ति त्र्यंबकेश्‍वर मार्ग पर लगभग 5 किमी दूरी से दिखाई देती है। जिसका पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव दि. 24 जनवरी 2016 को होने जा रहा है। समय समय पर यहाँ अनेक आचार्य, गुरुदेव का आगमन होताहा है। तथा उनके सानिध्यमें अनेक कार्यक्रम भी संपन् न हुये है। 1 वर्ष पूर्व ही यहाँ पर भगवान शांतिनाथ की प्राचिन प्रतिमा की स्थापना भी की गई है, जहाँ हर पूर्णिमा तथा अमावस्या को भव्य अभिषेक संपन्न होता है।

उपर उल्लेखानुसार मूर्ती विराजित होने के साथ ही अंजनगिरी तीर्थक्षेत्र के विकास की यात्रा शुरु हुई। यात्रा शुरु होने के पश्‍चात जिस प्रकार उसका समापन उसके लक्ष्य मंजिल पहूँचने पर होता है. उसी प्रकार इस क्षेत्र विकास यात्रा का समापन इसके चहुमुखी पूर्ण विकास का लक्ष्य प्राप्त करने पर ही होगा। इस क्षेत्र के विकास एवं नवनिर्माण की भावी प्रस्तावित योजनाओं के अंतर्गत भव्य आकर्षक व सुंदर जिनालय स्वाध्याय भवन, यात्री निवास (धर्मशाला) एवं छात्रावास आदि के निर्माण का लक्ष्य है। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में यहाँ आने वाले यात्रियों के लिए यात्री निवास के निर्माण का कार्य जारी है। इसके साथ ही हमें अन्य प्रस्तावित प्रकल्पों / योजनाओं के निर्माण कार्य भी अतिशीघ्र प्रारंभ कर उन्हें संपन्न भी करना है। इन भावी योजनाओं को क्रियान्वित / साकार करने के लिए संपूर्ण जैन जगत का न केवल आत्मिय समर्थन एवं सक्रिय सहयोग अपेक्षित हैस अपितु लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तम, मन के साथ..... धन की अत्यंत आवश्यकता है क्योंकि अर्थ बिना .... सब व्यर्थ है।

अतः समस्त जैन जगत से हमारा आग्रह पूर्वक विनर्म निवेदन है, पुरोजर अपील है कि आईये, स्वागत है आपका, हमारे साथ जुडकर, कंधे से कंधा मिलाकर एक साथ कदम मिलाकर इस क्षेत्र की खोई हुई गरिमा, इसके गौरव, वैभव को पुर्नजिवित व पुर्नस्थापित कर इसके मह्तल को पुनः प्रतिस्थापित करने के रुप में अपनी आहुती देकर इसके नव-निर्माण एवं विकास में भागीदर बन पुर्ण्याजन करे। स्मरणीय है कि शास्त्रों में उल्लखानुसार - एक प्राचीन मंदिर के जीर्णोध्दार का फल एक हजार नये मंदिरों के निर्माण के समतुल्य होता है।

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